द्रोण पर्व  अध्याय १५५

वासुदेव उवाच

आशीविष इव क्रुद्धः स्तम्भितो मन्त्रतेजसा |  २०   क
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति