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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाव्रुवन् |  ३८   क
द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परमं साम्यमास्थितः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति