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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
कुण्डलाभ्यां निमाय़ाथ दिव्येन कवचेन च |  २२   क
तां प्राप्यामन्यत वृषा सततं त्वां हतं रणे ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति