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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
एवं गतेऽपि शक्योऽय़ं हन्तुं नान्येन केनचित् |  २३   क
ऋते त्वा पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति