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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
व्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी निय़तव्रतः |  २४   क
रिपुष्वपि दय़ावांश्च तस्मात्कर्णो वृषा स्मृतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति