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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
मध्यङ्गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् |  २६   क
त्वदीय़ैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः |  २६   ख
शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति