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भीष्म पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
कुञ्जरेण प्रभिन्नेन सप्तधा स्रवता मदम् |  ३२   क
पर्वतेन यथा तोय़ं स्रवमाणेन सर्वतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति