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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
जरासन्धश्चेदिराजो महात्मा; महावलश्चैकलव्यो निषादः |  २९   क
एकैकशो निहताः सर्व एव; योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मय़ैव ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति