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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
स विनद्य महानादमभीशून्संनिय़म्य च |  ३   क
ननर्त हर्षसंवीतो वातोद्धूत इव द्रुमः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति