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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
ततो विनिर्भ्राम्य पुनः पार्थमास्फोट्य चासकृत् |  ४   क
रथोपस्थगतो भीमं प्राणदत्पुनरच्युतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति