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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन |  ८   क
तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति