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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
केचिदार्तस्वरं चक्रुर्विनेदुरपरे पुनः |  ४७   क
पार्थवाणहताः केचिन्निपेतुर्विगतासवः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति