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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
वृद्धक्षत्रः सैन्धवस्य पिता जगति विश्रुतः |  १७   क
स कालेनेह महता सैन्धवं प्राप्तवान्सुतम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति