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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीय़ते यथा |  १९   क
नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति