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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरगणाश्चैव स्रग्विणः प्रिय़दर्शनाः |  १८   क
महोरगगणाश्चैव सुपर्णाश्चोरगादय़ः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति