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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
न चाप्यतः परं शक्यं गन्तुं भरतसत्तमाः |  २१   क
विहारो ह्यत्र देवानाममानुषगतिस्तु सा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति