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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
चापलादिह गच्छन्तं पार्थ यानमतः परम् |  २४   क
अय़ःशूलादिभिर्घ्नन्ति राक्षसाः शत्रुसूदन ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति