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वन पर्व
अध्याय २४४
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वैशम्पाय़न उवाच
विविशुस्ते स्म कौरव्या वृता विप्रर्षभैस्तदा |  १६   क
तद्वनं भरतश्रेष्ठाः स्वर्गं सुकृतिनो यथा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति