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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
यथार्हं मानिताः कच्चित्त्वय़ा नन्दन्ति साधवः |  ९   क
वनेष्वपि वसन्कच्चिद्धर्ममेवानुवर्तसे ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति