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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः प्रीतिमान्विप्रः कृष्णेन स वभूव ह |  ३५   क
अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति