द्रोण पर्व  अध्याय १५६

वासुदेव उवाच

तत्र स्म राक्षसी घोरा जरा नामाशुविक्रमा |  १२   क
सन्धय़ामास तं जातं जरासन्धमरिन्दमम् ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति