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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
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वासुदेव उवाच
त्वद्धितार्थं तु स मय़ा हतः सङ्ग्राममूर्धनि |  २१   क
चेदिराजश्च विक्रान्तः प्रत्यक्षं निहतस्तव ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति