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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
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वासुदेव उवाच
स चाप्यशक्यः सङ्ग्रामे जेतुं सर्वैः सुरासुरैः |  २२   क
वधार्थं तस्य जातोऽहमन्येषां च सुरद्विषाम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति