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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
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वासुदेव उवाच
सुय़ोधनं चापि रणे हनिष्यति वृकोदरः |  ३१   क
तस्य चापि वधोपाय़ं वक्ष्यामि तव पाण्डव ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति