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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
चर्माणि वर्माणि मनोरथांश्च; प्रिय़ाणि सर्वाणि शिरांसि चैव |  ५६   क
चिच्छेद पार्थो द्विषतां प्रमुक्तै; र्वाणैः स्थितानामपराङ्मुखानाम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति