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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
श्रुतमेतत्त्वय़ा राजन्ननय़ोः कथितं द्वय़ोः |  १०४   क
प्रतिज्ञातं मय़ा यत्ते तद्गृहाणाविचारितम् ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति