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आदि पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालनगरं तस्मात्प्रविशध्वं महावलाः |  १५   क
सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशय़ः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति