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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षय़न्ति च |  २१   क
वृक्षानथौषधीश्चैव छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति