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शान्ति पर्व
अध्याय १५७
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भीष्म उवाच
एते प्रमत्तं पुरुषमप्रमत्ता नुदन्ति हि |  ४   क
वृका इव विलुम्पन्ति दृष्ट्वैव पुरुषेतरान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति