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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पुष्पाणि दिव्यानि सुहृद्भिः सह पाण्डवाः |  १७   क
ददृशुः पञ्च वर्णानि द्रौपदी च यशस्विनी ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति