वन पर्व  अध्याय १५७

जनमेजय़ उवाच

कानि चाभ्यवहार्याणि तत्र तेषां महात्मनाम् |  २   क
वसतां लोकवीराणामासंस्तद्व्रूहि सत्तम ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति