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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
खाण्डवे सत्यसन्धेन भ्रात्रा तव नरेश्वर |  २०   क
गन्धर्वोरगरक्षांसि वासवश्च निवारितः |  २०   ख
हता माय़ाविनश्चोग्रा धनुः प्राप्तं च गाण्डिवम् ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति