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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
तवापि सुमहत्तेजो महद्वाहुवलं च ते |  २१   क
अविषह्यमनाधृष्यं शतक्रतुवलोपमम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति