वन पर्व  अध्याय १५७

वैशम्पाय़न उवाच

सिंहर्षभगतिः श्रीमानुदारः कनकप्रभः |  २६   क
मनस्वी वलवान्दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति