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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
केसरीव यथोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः |  २९   क
व्यपेतभय़संमोहः शैलमभ्यपतद्वली ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति