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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या वर्धय़न्हर्षं गदामादाय़ पाण्डवः |  ३१   क
व्यपेतभय़संमोहः शैलराजं समाविशत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति