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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः |  ३२   क
कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति