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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः |  ३५   क
काञ्चनैः स्फाटिकाकारैर्वेश्मभिः समलङ्कृतम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति