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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवंय़ुक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः |  २१   क
कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपतिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति