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वन पर्व
अध्याय १५७
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जनमेजय़ उवाच
कच्चित्समागमस्तेषामासीद्वैश्रवणेन च |  ४   क
तत्र ह्याय़ाति धनद आर्ष्टिषेणो यथाव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति