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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षचराणां च भूमिष्ठानां च गर्जताम् |  ४४   क
शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महावलः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति