वन पर्व  अध्याय १५७

वैशम्पाय़न उवाच

भीमवाहुवलोत्सृष्टैर्वहुधा यक्षरक्षसाम् |  ४६   क
विनिकृत्तान्यदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ||  ४६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति