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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रिय़दर्शनम् |  ४७   क
ददृशुः सर्वभूतानि सूर्यमभ्रगणैरिव ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति