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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः |  ५२   क
सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति