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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
अदर्शय़दधीकारं पौरुषं च महावलः |  ५३   क
स तान्दृष्ट्वा परावृत्तान्स्मय़मान इवाव्रवीत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति