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उद्योग पर्व
अध्याय ११४
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नारद उवाच
समर्थेय़ं जनय़ितुं चक्रवर्तिनमात्मजम् |  ४   क
व्रूहि शुल्कं द्विजश्रेष्ठ समीक्ष्य विभवं मम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति