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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
एतदात्महितं श्रुत्वा तस्याप्रतिमतेजसः |  ६   क
शासनं सततं चक्रुस्तथैव भरतर्षभाः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति