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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं महाशूलं प्रगृह्य मणिमानपि |  ६५   क
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वेगेन महता नदन् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति