वन पर्व  अध्याय १५७

वैशम्पाय़न उवाच

सोऽन्तरिक्षमभिप्लुत्य विधूय़ सहसा गदाम् |  ६७   क
प्रचिक्षेप महावाहुर्विनद्य रणमूर्धनि ||  ६७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति