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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सेन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विसृष्टा वातरंहसा |  ६८   क
हत्वा रक्षः क्षितिं प्राप्य कृत्येव निपपात ह ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति